मोबाइल फोन की लत बच्चों में एक गंभीर मानसिक समस्या बन चुकी है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। शाहजहांपुर के राजकीय मेडिकल कॉलेज में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं, खासकर उन बच्चों में, जो लंबे समय तक मोबाइल फोन पर गेम खेलते हैं या सोशल मीडिया पर व्यस्त रहते हैं। यह समस्या सिर्फ शाहजहांपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में बच्चों में मोबाइल फोन की लत से संबंधित मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है।
मोबाइल फोन की लत से बच्चों में मानसिक समस्याओं का बढ़ना
कोरोना महामारी के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई ने बच्चों को मोबाइल फोन पर निर्भर बना दिया था, लेकिन अब जबकि महामारी समाप्त हो चुकी है, इसके बावजूद बच्चे मोबाइल से अपनी दूरी नहीं बना पा रहे हैं। शाहजहांपुर के राजकीय मेडिकल कॉलेज की मानसिक रोग विभाग की ओपीडी में रोजाना चार से पांच बच्चे इस लत से जूझते हुए इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। इन बच्चों को मोबाइल फोन से दूरी बनाना तो दूर, इसकी अनुपस्थिति में घबराहट और तनाव महसूस होता है।
डॉ. रोहताश ईसा, जो कि मानसिक रोग विभाग के क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक हैं, के अनुसार, बच्चों में इंटरनेट और मोबाइल फोन की लत का इलाज **व्यवहार चिकित्सा** के जरिए किया जाता है। इस प्रक्रिया में दवाओं की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि काउंसलिंग और मनोचिकित्सा द्वारा बच्चों की मानसिक स्थिति को ठीक किया जाता है।
बच्चों की मानसिक स्थिति पर मोबाइल की लत का असर
इन बच्चों में मोबाइल फोन की लत के कारण मानसिक स्थिति पर काफी असर पड़ता है। परिवार से बात करने की बजाय उनका समय अधिकतर मोबाइल पर ही बिता जाता है। इस कारण बच्चों के सामाजिक व्यवहार में भी गिरावट आती है। वे परिवार और दोस्तों से कट जाते हैं और अकेलेपन का सामना करते हैं। जब उन्हें मोबाइल नहीं दिया जाता, तो वे आक्रामक हो जाते हैं, घर के सामान को फेंकने लगते हैं या मानसिक तनाव से जूझने लगते हैं।
एक केस का उदाहरण लेते हैं, तारीन जलालनगर का 12 साल का बच्चा मोबाइल पर कार्टून देखने का आदी हो गया था। जब उसे मोबाइल नहीं दिया जाता, तो वह आक्रामक हो जाता और घर का सामान फेंकने लगता। इस मामले में बच्चे के पिता ने मानसिक रोग विभाग में इलाज शुरू किया, और अब बच्चे में सुधार देखा गया है।
बच्चों की मानसिक स्थिति में सुधार कैसे लाया जा सकता है?
डॉ. गौरव वर्मा, जो कि मानसिक रोग विभाग के अध्यक्ष हैं, ने बताया कि बच्चों में मोबाइल की लत के कारण मानसिक तनाव और घबराहट के मामलों में वृद्धि हो रही है। इसका इलाज पूरी तरह से संभव है, बशर्ते अभिभावक इस समस्या को समय रहते पहचानें और बच्चों को सही मार्गदर्शन दें। उन्होंने यह भी बताया कि बच्चों में इंटरनेट की लत को कम करने के लिए माता-पिता को अपनी आदतों में सुधार करना होगा, क्योंकि बच्चे अपने माता-पिता को देख कर ही सीखते हैं।
माता-पिता की भूमिका
मोबाइल फोन की लत में बच्चों की भूमिका के साथ-साथ माता-पिता की भी जिम्मेदारी होती है। जब माता-पिता लंबे समय तक मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं, तो बच्चों को भी उसी आदत का पालन करने की प्रवृत्ति होती है। इसके अलावा, कई बार माता-पिता बच्चों को चुपचाप मोबाइल दे देते हैं ताकि वे चुप रहें और उनका काम न रुके। लेकिन इस तरह की आदतें बच्चों को मोबाइल की लत में डाल देती हैं, जो आगे चलकर मानसिक समस्याओं का कारण बन सकती हैं।
इंटरनेट की लत: मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक नई चुनौती
आज के आधुनिक समय में बच्चों की मानसिक समस्याओं की एक नई श्रेणी सामने आई है, जो इंटरनेट और मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग से संबंधित है। यह नशे की तरह है और बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित करता है। मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग और व्यवहार चिकित्सा के माध्यम से इस समस्या से उबरने के उपाय उपलब्ध हैं, लेकिन इसके लिए बच्चों के साथ-साथ माता-पिता का भी सहयोग जरूरी है।
मोबाइल फोन की लत बच्चों की मानसिक स्थिति को बिगाड़ने के साथ-साथ उनकी सामाजिक और शैक्षिक जीवन को भी प्रभावित कर सकती है। इसके लिए अभिभावकों को सतर्क रहना होगा और बच्चों को मोबाइल के उपयोग में सीमित रखना होगा। बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए चिकित्सा और काउंसलिंग के अलावा, परिवारों को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।
यदि आप भी अपने बच्चे के मोबाइल उपयोग को लेकर चिंतित हैं, तो उसे नजरअंदाज न करें और सही समय पर पेशेवर सहायता लें।
